आदित्य-L1: सूर्य का अध्ययन करने वाला भारत का पहला मिशन
आदित्य-L1 भारत की पहली अंतरिक्ष सौर वेधशाला है: 2 सितंबर 2023 को लॉन्च, 6 जनवरी 2024 से L1 बिंदु पर, और सात उपकरणों से सूर्य पर लगातार नज़र।
रोहित टंडन · 17 अक्टूबर 2026 · 4 मिनट
सूर्य हमारी पृथ्वी पर जीवन का आधार है, लेकिन उसकी आँधियाँ अंतरिक्ष में हमारे उपग्रहों के लिए ख़तरा भी बन सकती हैं। सूर्य को बिना रुके देखने और समझने के लिए इसरो ने आदित्य-L1 भेजा — भारत की पहली अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला। "आदित्य" संस्कृत में सूर्य का ही एक नाम है, और "L1" उस ख़ास जगह का नाम है जहाँ यह यान तैनात है।
आदित्य-L1 एक नज़र में
| बात | जानकारी |
|---|---|
| लॉन्च | 2 सितंबर 2023, PSLV-C57, श्रीहरिकोटा |
| L1 की हेलो कक्षा में | 6 जनवरी 2024 |
| पृथ्वी से दूरी | लगभग 15 लाख किलोमीटर |
| सफ़र | लगभग 4 महीने |
| उपकरण | 7 — इनमें 4 सूर्य को देखते हैं और 3 वहीं के कणों और चुंबकीय क्षेत्र को नापते हैं |
L1 बिंदु क्या है?
सूर्य और पृथ्वी के बीच पाँच ऐसी जगहें हैं जहाँ दोनों का गुरुत्व-खिंचाव इस तरह संतुलित होता है कि कोई छोटा यान बहुत कम ईंधन में अपनी जगह पर टिका रह सकता है। इन्हें गणितज्ञ जोसेफ़-लुई लाग्रांज के नाम पर "लाग्रांज बिंदु" कहा जाता है। इनमें L1 पृथ्वी से सूर्य की ओर लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है। यहाँ से सूर्य हमेशा दिखता है — न पृथ्वी बीच में आती है, न चाँद — इसलिए कभी ग्रहण नहीं लगता। आदित्य-L1 इस बिंदु के चारों ओर "हेलो कक्षा" में घूमता है।
क्या आप जानते हैं? 15 लाख किलोमीटर की दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी का केवल लगभग 1% है, फिर भी यह पृथ्वी से चाँद की दूरी (लगभग 3.84 लाख किलोमीटर) से करीब चार गुना ज़्यादा है।
L1 तक का सफ़र
लॉन्च के बाद आदित्य-L1 कुछ दिन पृथ्वी के चारों ओर घूमता रहा, और इस दौरान चार बार इंजन चलाकर उसकी कक्षा बड़ी की गई। 19 सितंबर 2023 को एक बड़े धक्के के साथ इसने पृथ्वी के प्रभाव क्षेत्र को छोड़ा और L1 की ओर चल पड़ा। लगभग चार महीने के सफ़र के बाद, 6 जनवरी 2024 को, इसे L1 के चारों ओर की हेलो कक्षा में स्थापित कर दिया गया। यह इसरो का किसी लाग्रांज बिंदु पर पहला मिशन था, और इसके ज़्यादातर उपकरण भारत के ही वैज्ञानिक संस्थानों ने बनाए।
सूर्य के बारे में कुछ तथ्य
- सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास से लगभग 109 गुना है।
- सूर्य की रोशनी को हम तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट 20 सेकंड लगते हैं।
- सूर्य एक तारा है, जो मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम से बना है और अपने केंद्र में नाभिकीय संलयन से चमकता है।
आदित्य-L1 के सात उपकरण
- VELC: सबसे बड़ा उपकरण, जो सूर्य के बाहरी वातावरण "कोरोना" का अध्ययन करता है (भारतीय तारा भौतिकी संस्थान, बेंगलुरु ने बनाया)।
- SUIT: पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट) रोशनी में सूर्य की तस्वीरें लेता है (IUCAA, पुणे)।
- SoLEXS और HEL1OS: सौर ज्वालाओं (फ़्लेयर) से निकलने वाली एक्स-रे को नापते हैं।
- ASPEX और PAPA: सूर्य से आने वाली "सौर पवन" के कणों का अध्ययन करते हैं।
- मैग्नेटोमीटर: L1 पर चुंबकीय क्षेत्र को नापता है।
सूर्य का अध्ययन क्यों ज़रूरी है?
सूर्य से कभी-कभी तेज़ ज्वालाएँ और "कोरोनल मास इजेक्शन" (CME) यानी चार्ज कणों के विशाल बादल निकलते हैं। जब ये पृथ्वी की ओर आते हैं, तो उपग्रहों, GPS, रेडियो संचार और बिजली ग्रिड में गड़बड़ी हो सकती है। इसे "अंतरिक्ष मौसम" कहते हैं। आदित्य-L1 पृथ्वी तक पहुँचने से पहले ही इन कणों को देख सकता है, जिससे चेतावनी देने में मदद मिलती है। मई 2024 में आए बड़े सौर तूफ़ान को भी आदित्य-L1 के उपकरणों ने दर्ज किया।
एक बड़ा रहस्य भी है: सूर्य की सतह का तापमान लगभग 5,500 डिग्री सेल्सियस है, लेकिन उसके बाहर का कोरोना लाखों डिग्री गर्म है। ऐसा क्यों है, यह समझना भी इस मिशन का लक्ष्य है। सूर्य और चाँद से जुड़ी घटनाएँ ग्रहण कैसे लगते हैं में पढ़ें, और भारत में सूर्य की उपासना के पर्व के बारे में छठ पूजा के रोचक तथ्य में।
मुख्य बिंदु
- आदित्य-L1 भारत की पहली अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला है।
- इसे 2 सितंबर 2023 को PSLV-C57 से लॉन्च किया गया।
- 6 जनवरी 2024 को यह L1 बिंदु की हेलो कक्षा में पहुँचा।
- L1 बिंदु पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है।
- इसमें सात वैज्ञानिक उपकरण हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आदित्य-L1 कब लॉन्च हुआ?
2 सितंबर 2023 को, श्रीहरिकोटा से PSLV-C57 रॉकेट द्वारा।
L1 बिंदु पृथ्वी से कितनी दूर है?
लगभग 15 लाख किलोमीटर, सूर्य की दिशा में।
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स्रोत
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