आज़ादी के आंदोलन के प्रसिद्ध नारे और उन्हें किसने दिया
"इंक़लाब ज़िंदाबाद", "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है", "करो या मरो", "तुम मुझे ख़ून दो" — आज़ादी के प्रसिद्ध नारे, उनके रचयिता और पृष्ठभूमि एक तालिका में।
रोहित टंडन · 8 अक्टूबर 2026 · 3 मिनट
भारत की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ जुलूसों और जेलों की लड़ाई नहीं थी — यह शब्दों की ताक़त की भी लड़ाई थी। कुछ शब्द इतने असरदार थे कि वे करोड़ों लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गए और आंदोलन की पहचान बन गए। "भारत का पहला नारा कौन-सा था?" — इसका कोई एक आधिकारिक उत्तर नहीं है, लेकिन आज़ादी के आंदोलन के कुछ नारे इतिहास में अमर हो गए। यहाँ ऐसे ही प्रसिद्ध नारे और उनके पीछे की कहानियाँ हैं।
प्रसिद्ध नारे एक नज़र में
| नारा | किससे जुड़ा | पृष्ठभूमि |
|---|---|---|
| वंदे मातरम् | बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय | उपन्यास "आनंदमठ" (1882) का गीत; बंगाल विभाजन विरोध (1905) में गूँजा |
| स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा | बाल गंगाधर तिलक | होम रूल आंदोलन का दौर |
| इंक़लाब ज़िंदाबाद | मौलाना हसरत मोहानी (रचना); भगत सिंह और साथियों ने लोकप्रिय बनाया | 1920 का दशक |
| साइमन गो बैक | देशव्यापी विरोध | 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार में |
| करो या मरो | महात्मा गांधी | 8 अगस्त 1942, भारत छोड़ो आंदोलन |
| तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा | नेताजी सुभाष चंद्र बोस | 1944, आज़ाद हिंद फ़ौज |
| दिल्ली चलो | नेताजी सुभाष चंद्र बोस | आज़ाद हिंद फ़ौज का आह्वान |
| जय हिंद | आज़ाद हिंद फ़ौज और नेताजी | अभिवादन जो आज भी देश भर में प्रचलित है |
"इंक़लाब ज़िंदाबाद" की कहानी
"इंक़लाब ज़िंदाबाद" का अर्थ है "क्रांति अमर रहे"। यह नारा उर्दू शायर और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 के आसपास दिया था। बाद में भगत सिंह और उनके साथियों ने इसे अपनी पहचान बना लिया — 1929 में केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने के बाद भी उन्होंने यही नारा लगाया था।
"करो या मरो"
8 अगस्त 1942 को बंबई (मुंबई) के गोवालिया टैंक मैदान — जिसे आज अगस्त क्रांति मैदान कहते हैं — में महात्मा गांधी ने "भारत छोड़ो" का आह्वान किया और देशवासियों से कहा: "करो या मरो"। अगले ही दिन गांधीजी समेत कांग्रेस के बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए, फिर भी आंदोलन पूरे देश में फैल गया।
क्या आप जानते हैं? "सत्यमेव जयते" — यानी "सत्य की ही विजय होती है" — मुण्डक उपनिषद से लिया गया है और यह भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है, जो राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे लिखा होता है।
आज़ादी के बाद के प्रसिद्ध नारे
- जय जवान, जय किसान: 1965 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सैनिकों और किसानों के सम्मान में यह नारा दिया।
- जय विज्ञान: 1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण परीक्षणों के बाद "जय जवान, जय किसान" के साथ "जय विज्ञान" जोड़ा।
"सरफ़रोशी की तमन्ना"
"सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" — यह मशहूर ग़ज़ल बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखी थी। काकोरी कांड से जुड़े क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों ने इसे इतना गाया कि यह पूरे आंदोलन का तराना बन गई।
नारों की ताक़त क्यों?
एक अच्छा नारा छोटा, याद रखने में आसान और भावनाओं से भरा होता है। अनपढ़ और पढ़े-लिखे, गाँव और शहर — सब उसे एक साथ बोल सकते हैं। इसीलिए आज़ादी के आंदोलन में नारों ने लोगों को जोड़ने और साहस देने का काम किया।
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स्रोत
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