पोलोनियम-210: दुनिया के सबसे ख़तरनाक पदार्थों में से एक क्यों?
मैरी क्यूरी द्वारा खोजा गया पोलोनियम अल्फ़ा विकिरण छोड़ता है जो त्वचा पार नहीं कर पाता, पर शरीर के अंदर पहुँचकर बेहद हानिकारक है। इसका विज्ञान, उपयोग और सावधानियाँ।
रोहित टंडन · 4 अक्टूबर 2026 · 3 मिनट
रसायन विज्ञान की आवर्त सारणी में कई तत्व ऐसे हैं जिनके नाम आम लोगों ने कम ही सुने होते हैं। पोलोनियम उन्हीं में से एक है — एक दुर्लभ, रेडियोधर्मी तत्व जिसकी एक ख़ास क़िस्म, पोलोनियम-210, अपनी विषाक्तता के लिए जानी जाती है। आइए समझते हैं कि यह इतना ख़तरनाक क्यों है और विज्ञान में इसका क्या महत्व है।
खोज: मैरी और पियरे क्यूरी (1898)
पोलोनियम की खोज 1898 में मैरी क्यूरी और पियरे क्यूरी ने यूरेनियम के अयस्क "पिचब्लेंड" पर शोध करते हुए की थी। मैरी क्यूरी ने इसका नाम अपनी जन्मभूमि पोलैंड के नाम पर रखा, जो उस समय स्वतंत्र देश नहीं था — यह नाम एक तरह से अपने देश को सम्मान देने का तरीका था। इसी वर्ष क्यूरी दंपती ने रेडियम की भी खोज की।
मूल बातें
| प्रतीक | Po |
|---|---|
| परमाणु क्रमांक | 84 |
| सबसे प्रसिद्ध समस्थानिक | पोलोनियम-210 |
| अर्ध-आयु (Po-210) | लगभग 138 दिन |
| विकिरण का प्रकार | अल्फ़ा कण |
ख़तरनाक क्यों है?
पोलोनियम-210 अल्फ़ा कण छोड़ता है। अल्फ़ा कण बहुत भारी होते हैं और काग़ज़ की एक शीट या हमारी त्वचा की बाहरी परत भी उन्हें रोक सकती है। इसलिए शरीर के बाहर रहने पर यह उतना हानिकारक नहीं होता। लेकिन अगर यह साँस, भोजन या घाव के रास्ते शरीर के अंदर पहुँच जाए, तो इसके अल्फ़ा कण आसपास की कोशिकाओं को सीधे नुक़सान पहुँचाते हैं। इसकी बेहद छोटी मात्रा भी अंगों को गंभीर क्षति पहुँचा सकती है। यही कारण है कि इसे दुनिया के सबसे विषैले पदार्थों में गिना जाता है।
क्या आप जानते हैं? पोलोनियम-210 बहुत कम मात्रा में तंबाकू के धुएँ में भी पाया जाता है। यह धूम्रपान के नुक़सानों का एक और कारण है।
क्या इसके कोई उपयोग भी हैं?
- स्थैतिक बिजली हटाना: कुछ औद्योगिक उपकरणों में धूल और स्थैतिक बिजली हटाने के लिए नियंत्रित, सील की हुई मात्रा में इसका उपयोग होता रहा है।
- अंतरिक्ष यान: शुरुआती दौर में कुछ अंतरिक्ष यानों में इसकी गर्मी का इस्तेमाल उपकरणों को गर्म रखने के लिए किया गया।
- वैज्ञानिक शोध: रेडियोधर्मिता और परमाणु भौतिकी को समझने में इसकी भूमिका रही है।
भारत में रेडियोधर्मी पदार्थों की निगरानी
भारत में रेडियोधर्मी पदार्थों के सुरक्षित उपयोग और उनकी निगरानी की ज़िम्मेदारी परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की है। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले विकिरण उपकरणों से लेकर उद्योगों तक, हर जगह इनके इस्तेमाल के लिए लाइसेंस और कड़े सुरक्षा नियम लागू होते हैं।
हमारे लिए सीख
रेडियोधर्मिता अपने-आप में बुरी नहीं है — इसी विज्ञान से कैंसर का इलाज, बिजली उत्पादन और चिकित्सा जाँचें संभव हुई हैं। लेकिन इसके साथ ज़िम्मेदारी और सख़्त सुरक्षा ज़रूरी है। मैरी क्यूरी ने इस क्षेत्र में दो नोबेल पुरस्कार जीते, पर लंबे समय तक विकिरण के संपर्क में रहने से उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा — यह याद दिलाता है कि विज्ञान में सावधानी कितनी ज़रूरी है।
रेडियोधर्मिता और अर्ध-आयु — आसान भाषा में
कुछ तत्वों के परमाणु का केंद्रक (नाभिक) अस्थिर होता है। स्थिर होने के लिए वह धीरे-धीरे कण या ऊर्जा छोड़ता है — इसी को रेडियोधर्मिता कहते हैं। ये विकिरण मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं: अल्फ़ा, बीटा और गामा। "अर्ध-आयु" वह समय है जिसमें किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की आधी मात्रा बदल जाती है। पोलोनियम-210 की अर्ध-आयु लगभग 138 दिन है, यानी 138 दिन बाद उसकी आधी मात्रा ही बचती है।
और पढ़ें: विज्ञान के प्रश्न · आज का इतिहास।
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