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दुनिया की सबसे महँगी लकड़ी: अफ़्रीकन ब्लैकवुड और भारत का चंदन

पानी में डूब जाने वाली अफ़्रीकन ब्लैकवुड से शहनाई जैसे वाद्य बनते हैं; भारत में चंदन और लाल चंदन क़ीमती हैं। जानिए कुछ लकड़ियाँ इतनी महँगी क्यों होती हैं।

· 4 अक्टूबर 2026 · 3 मिनट

लकड़ी हमारे घरों, फ़र्नीचर और रोज़मर्रा की चीज़ों का हिस्सा है, और ज़्यादातर लकड़ियाँ आसानी से मिल जाती हैं। लेकिन कुछ लकड़ियाँ इतनी दुर्लभ और ख़ास होती हैं कि उनकी क़ीमत सोने-चाँदी जैसी क़ीमती चीज़ों से तुलना करके बताई जाती है। ऐसी ही एक लकड़ी है — अफ़्रीकन ब्लैकवुड।

अफ़्रीकन ब्लैकवुड क्या है?

अफ़्रीकन ब्लैकवुड (वैज्ञानिक नाम Dalbergia melanoxylon) पूर्वी अफ़्रीका के सूखे इलाक़ों — जैसे तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक — में उगने वाला एक छोटा, काँटेदार पेड़ है। इसकी भीतरी लकड़ी (हार्टवुड) गहरी काली या बैंगनी-भूरी, बहुत सख़्त और बहुत भारी होती है। यह इतनी घनी होती है कि पानी में डूब जाती है।

यह इतनी महँगी क्यों है?

  • धीमी बढ़त: इस पेड़ को काम लायक़ बड़ा होने में कई दशक लगते हैं।
  • कम उपयोगी हिस्सा: पेड़ टेढ़ा-मेढ़ा होता है, इसलिए उसमें से अच्छी, बिना दरार वाली लकड़ी बहुत कम निकलती है।
  • ख़ास उपयोग: इसकी सख़्ती और स्थिरता के कारण इससे क्लैरिनेट, ओबो और बैगपाइप जैसे वाद्य यंत्र बनाए जाते हैं, जिनकी आवाज़ इसकी वजह से साफ़ और गूँजदार होती है।
  • घटती उपलब्धता: ज़्यादा कटाई के कारण इसकी उपलब्धता कम हुई है, और इसके व्यापार पर निगरानी बढ़ाई गई है।

क्या आप जानते हैं? अफ़्रीकन ब्लैकवुड शीशम (रोज़वुड) के ही परिवार — डालबर्जिया वंश — का पेड़ है। भारत में मिलने वाला शीशम भी इसी वंश का सदस्य है।

भारत की क़ीमती लकड़ियाँ

चंदन (सफ़ेद चंदन)

भारतीय चंदन (Santalum album) अपनी ख़ुशबू के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह मुख्य रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में पाया जाता है। इसकी लकड़ी और तेल का इस्तेमाल इत्र, अगरबत्ती, साबुन और पूजा में होता है। पेड़ को अच्छी ख़ुशबू वाली लकड़ी देने में कई साल लगते हैं, इसलिए यह बहुत महँगा होता है।

लाल चंदन

लाल चंदन (Pterocarpus santalinus) मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के शेषाचलम पहाड़ों में मिलता है। इसकी गहरी लाल लकड़ी विदेशों में बहुत माँग में रहती है। इसकी अवैध कटाई और तस्करी रोकने के लिए सरकार ने इसके व्यापार पर कड़े नियम बनाए हैं।

अगरवुड

पूर्वोत्तर भारत (ख़ासकर असम) में मिलने वाले अगर के पेड़ में जब एक ख़ास फफूँद का संक्रमण होता है, तो उसकी लकड़ी में सुगंधित राल बनती है। इसी से "ऊद" नाम का बेहद महँगा इत्र बनता है।

हमारे लिए सीख

किसी लकड़ी के महँगा होने के पीछे अक्सर उसकी धीमी बढ़त और दुर्लभता होती है — यानी प्रकृति ने उसे बनाने में बहुत समय लगाया है। इसलिए ऐसे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई उन्हें विलुप्ति की ओर ले जा सकती है। प्रमाणित और क़ानूनी स्रोतों से ही लकड़ी ख़रीदना और पेड़ लगाना इन प्रजातियों को बचाने के सबसे आसान तरीके हैं।

लकड़ी की सख़्ती कैसे नापी जाती है?

लकड़ी कितनी सख़्त है, यह जानने के लिए "जांका कठोरता परीक्षण" (Janka hardness test) का उपयोग होता है। इसमें देखा जाता है कि स्टील की एक छोटी गेंद को लकड़ी में उसके आधे व्यास तक धँसाने के लिए कितना बल लगता है। अफ़्रीकन ब्लैकवुड इस पैमाने पर दुनिया की सबसे सख़्त लकड़ियों में आती है। भारत में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला सागौन (टीक) अपनी मज़बूती और दीमक से बचाव के लिए जाना जाता है, इसलिए इससे अच्छे फ़र्नीचर और दरवाज़े बनते हैं।

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