गोल्डन ब्लड ग्रुप (Rh-null) क्या है? दुनिया का सबसे दुर्लभ खून
Rh-null खून में Rh तंत्र का कोई एंटीजन नहीं होता, इसलिए इसे "गोल्डन ब्लड" कहते हैं। जानिए यह कितना दुर्लभ है और भारत के "बॉम्बे ब्लड ग्रुप" से यह कैसे अलग है।
रोहित टंडन · 4 अक्टूबर 2026 · 3 मिनट
हम में से ज़्यादातर लोग अपना ब्लड ग्रुप A, B, AB या O और साथ में "पॉज़िटिव" या "नेगेटिव" के रूप में जानते हैं। लेकिन दुनिया में एक ऐसा रक्त समूह भी है जो इतना दुर्लभ है कि उसे "गोल्डन ब्लड" कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम है Rh-null।
पहले समझिए: ब्लड ग्रुप बनता कैसे है?
हमारी लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर कुछ ख़ास प्रोटीन और शर्करा के अणु होते हैं, जिन्हें एंटीजन कहते हैं। इन्हीं एंटीजन के आधार पर ब्लड ग्रुप तय होता है। सबसे जाना-पहचाना ABO तंत्र है। दूसरा बड़ा तंत्र Rh तंत्र है — जिसमें सबसे ख़ास एंटीजन "D" है। अगर किसी के ख़ून में D एंटीजन है तो वह Rh पॉज़िटिव और न हो तो Rh नेगेटिव कहलाता है। लेकिन Rh तंत्र में सिर्फ़ D नहीं, बल्कि दर्जनों अलग-अलग एंटीजन होते हैं।
Rh-null में क्या ख़ास है?
Rh-null वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं पर Rh तंत्र का एक भी एंटीजन नहीं होता। यह स्थिति आनुवंशिक (जीन से जुड़ी) होती है। इसे पहली बार 1961 में ऑस्ट्रेलिया की एक मूल निवासी महिला में पहचाना गया था। तब से अब तक दुनिया भर में गिने-चुने लोगों में ही यह खून मिला है — इसलिए इसे दुनिया का सबसे दुर्लभ रक्त समूह माना जाता है।
इसे "गोल्डन" क्यों कहते हैं?
- दुर्लभता: यह इतना कम मिलता है कि इसकी हर इकाई क़ीमती है।
- दान में उपयोगी: Rh तंत्र के दुर्लभ समूह वाले मरीज़ों के लिए, जिन्हें सामान्य खून नहीं चढ़ाया जा सकता, Rh-null खून मददगार हो सकता है (ABO मेल खाना फिर भी ज़रूरी है)।
- मुश्किल भी: Rh-null व्यक्ति को ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ़ Rh-null खून ही चढ़ाया जा सकता है, जो मिलना बेहद कठिन है। इसलिए ऐसे लोगों को अक्सर पहले से अपना खून सुरक्षित रखवाने की सलाह दी जाती है।
क्या आप जानते हैं? Rh-null वाले कुछ लोगों में हल्की रक्ताल्पता (एनीमिया) हो सकती है, क्योंकि Rh प्रोटीन लाल रक्त कोशिकाओं की झिल्ली को मज़बूत रखने में भी मदद करते हैं।
भारत का दुर्लभ रक्त समूह: बॉम्बे ब्लड ग्रुप
भारत से जुड़ा एक और दुर्लभ समूह है — बॉम्बे ब्लड ग्रुप (hh)। इसकी खोज 1952 में मुंबई में डॉ. वाई. एम. भेंडे ने की थी, इसलिए इसका नाम शहर पर पड़ा। इस समूह वाले लोगों में "H" एंटीजन नहीं होता, जिससे सामान्य जाँच में उनका खून कई बार O ग्रुप जैसा दिखता है। अगर ऐसे मरीज़ को साधारण O ग्रुप का खून चढ़ा दिया जाए तो गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है। इसलिए दुर्लभ समूहों की सही जाँच बेहद ज़रूरी है।
Rh-null और बॉम्बे ग्रुप में अंतर
| Rh-null (गोल्डन ब्लड) | बॉम्बे ब्लड ग्रुप | |
|---|---|---|
| किस तंत्र से जुड़ा | Rh तंत्र | ABO/H तंत्र |
| क्या नहीं होता | Rh के सभी एंटीजन | H एंटीजन |
| पहली पहचान | 1961, ऑस्ट्रेलिया | 1952, मुंबई |
| किसका खून चढ़ सकता है | केवल Rh-null | केवल बॉम्बे ग्रुप |
हमारे लिए सीख
दुर्लभ रक्त समूह वाले मरीज़ों की जान अक्सर उन्हीं जैसे दाताओं पर टिकी होती है। इसलिए नियमित रक्तदान, अपने ब्लड ग्रुप की सही जानकारी और दुर्लभ दाता रजिस्ट्री में नाम दर्ज कराना समाज के लिए बड़ी मदद है। 18 से 65 वर्ष के स्वस्थ लोग, डॉक्टर की सलाह के अनुसार, रक्तदान कर सकते हैं।
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