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इसका अर्थ
शिक्षा केवल उन लोगों की सुविधा नहीं है जो स्कूल या कॉलेज का खर्च उठा सकते हैं। यह हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है। पढ़ना, लिखना और सही ढंग से सोचना सीखकर व्यक्ति दुनिया को बेहतर समझ सकता है, अपने फैसले खुद ले सकता है और नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकता है।
इस विचार का गहरा अर्थ यह है कि शिक्षा से व्यक्ति के साथ-साथ पूरे देश को लाभ मिलता है। जो विद्यार्थी सवाल पूछना, अलग-अलग विचारों को समझना और अफवाहों तथा तथ्यों में अंतर करना सीखता है, वह जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ता है। उदाहरण के लिए, पढ़ना जानने वाला बच्चा बैंक का फॉर्म समझ सकता है, सरकारी सूचना पढ़ सकता है और भ्रामक जानकारी पहचान सकता है। ये रोजमर्रा के कौशल बताते हैं कि बुनियादी शिक्षा हर बच्चे तक पहुँचना क्यों जरूरी है।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शिक्षा पर विचार यही संदेश देते हैं कि सीखने के अवसर केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। एक न्यायपूर्ण समाज वह है जो हर बच्चे को ज्ञान हासिल करने, आत्मनिर्भर बनने और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित होने का अवसर दे।
संदर्भ: भारत के पहले शिक्षा मंत्री (1947–1958) मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने यह बात 16 जनवरी 1948 को अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन में कही थी। हर बच्चे को मुफ़्त बुनियादी शिक्षा देने का विचार संविधान के अनुच्छेद 45 में आया; 2002 में अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा मौलिक अधिकार बनी, और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 ने 6 से 14 साल के बच्चों के लिए इसे मुफ़्त और अनिवार्य कर दिया। उनका जन्मदिन, 11 नवंबर, राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
स्रोत
All India Education Conference, 16 January 1948 (अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन, 16 जनवरी 1948)