कोणार्क सूर्य मंदिर: पत्थर का रथ और उसके पहियों का रहस्य
कोणार्क सूर्य मंदिर के तथ्य: 13वीं सदी में राजा नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया, 24 पहियों और 7 घोड़ों वाला सूर्य का रथ, समय बताने वाले पहिए और "ब्लैक पगोडा"।
रोहित टंडन · 23 अक्टूबर 2026 · 4 मिनट
ओडिशा के समुद्र तट के पास खड़ा कोणार्क सूर्य मंदिर एक मंदिर ही नहीं, पत्थर में तराशा गया एक विशाल रथ है — सूर्य देव का रथ, जिसे सात घोड़े खींच रहे हैं। इसकी नक़्क़ाशी इतनी बारीक और विशाल है कि इसे भारतीय मंदिर वास्तुकला के सबसे बड़े चमत्कारों में गिना जाता है। 1984 में यह यूनेस्को विश्व धरोहर बना।
कोणार्क एक नज़र में
| बात | जानकारी |
|---|---|
| कहाँ | कोणार्क, पुरी ज़िला, ओडिशा |
| किसने बनवाया | पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम |
| कब | लगभग 1250 ईस्वी |
| किसको समर्पित | सूर्य देव |
| रथ | 24 पहिए (12 जोड़े) और 7 घोड़े |
| सम्मान | 1984 में यूनेस्को विश्व धरोहर |
नाम का अर्थ
"कोणार्क" दो शब्दों से बना है — "कोण" यानी कोना और "अर्क" यानी सूर्य। यानी "सूर्य का कोना" या सूर्य का स्थान। सूर्य को समर्पित यह मंदिर इस बात का प्रतीक है कि प्राचीन भारत में सूर्य की उपासना कितनी महत्वपूर्ण थी — सूर्य के विज्ञान के बारे में पढ़ें सूर्य के रोचक तथ्य।
24 पहियों का रहस्य
मंदिर के दोनों ओर 12-12 यानी कुल 24 विशाल पहिए तराशे गए हैं, जिनका व्यास लगभग 3 मीटर है। माना जाता है कि ये साल के 12 महीनों या 24 पखवाड़ों का प्रतीक हैं, और सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों का। सबसे रोचक बात यह है कि ये पहिए धूप-घड़ी की तरह भी काम करते हैं। हर पहिए में 8 बड़ी और 8 छोटी तीलियाँ हैं। जब सूर्य की रोशनी पड़ती है, तो तीलियों की छाया देखकर दिन का समय काफ़ी सटीकता से बताया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं? कोणार्क का पहिया आज भारत की पहचान बन चुका है। 2018 में आए 10 रुपये के नए नोट के पिछले हिस्से पर कोणार्क सूर्य मंदिर का चित्र है, और 2023 में दिल्ली में हुए G20 शिखर सम्मेलन में दुनिया के नेताओं का स्वागत कोणार्क चक्र की पृष्ठभूमि में किया गया।
"ब्लैक पगोडा" क्यों?
पुराने ज़माने में समुद्र से गुज़रने वाले यूरोपीय नाविक दिशा पहचानने के लिए तट पर दिखने वाले ऊँचे मंदिरों का इस्तेमाल करते थे। गहरे रंग के पत्थर से बने कोणार्क मंदिर को वे "ब्लैक पगोडा" (काला पगोडा) कहते थे, जबकि पुरी के सफ़ेद चूने से पुते जगन्नाथ मंदिर को "व्हाइट पगोडा"।
आज का कोणार्क
मंदिर का मुख्य गर्भगृह और उसका ऊँचा शिखर, जो लगभग 70 मीटर ऊँचा माना जाता है, सदियों पहले गिर गया। आज जो भव्य इमारत दिखती है, वह असल में "जगमोहन" यानी सभा-मंडप है। 1903 में अंग्रेज़ों ने इसे गिरने से बचाने के लिए इसके अंदर रेत भरकर इसे बंद कर दिया था। दीवारों पर देवी-देवताओं, नर्तकों, संगीतकारों, हाथियों, शिकार और रोज़मर्रा के जीवन की हज़ारों बारीक मूर्तियाँ तराशी गई हैं। लोककथाओं में कहा जाता है कि इसे 1,200 कारीगरों ने 12 साल में बनाया था, लेकिन यह एक परंपरा है, पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।
कोणार्क नृत्य महोत्सव
हर साल दिसंबर की शुरुआत में मंदिर के पास खुले मंच पर "कोणार्क नृत्य महोत्सव" होता है, जिसमें ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक और दूसरे शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं। पत्थर की नर्तकियों के सामने जीवित नर्तक — यह दृश्य बेहद सुंदर होता है। भारतीय संस्कृति के बारे में और पढ़ें: भारतीय संस्कृति के रोचक तथ्य। सूर्य की उपासना का पर्व: छठ पूजा।
मुख्य बिंदु
- कोणार्क सूर्य मंदिर ओडिशा में है और लगभग 1250 में बना।
- इसे पूर्वी गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया।
- मंदिर सूर्य के रथ के आकार का है — 24 पहिए और 7 घोड़े।
- इसके पहिए धूप-घड़ी की तरह समय बताते हैं।
- 10 रुपये के नए नोट पर कोणार्क मंदिर का चित्र है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कोणार्क सूर्य मंदिर किसने बनवाया?
पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने, लगभग 1250 ईस्वी में।
कोणार्क मंदिर को "ब्लैक पगोडा" क्यों कहते हैं?
गहरे रंग के कारण यूरोपीय नाविक इसे ब्लैक पगोडा कहते थे, जबकि पुरी का जगन्नाथ मंदिर "व्हाइट पगोडा" कहलाता था।
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स्रोत
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