प्राचीन भारत के विश्वविद्यालय: नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला
प्राचीन भारत के विश्वविद्यालय: तक्षशिला में चाणक्य, नालंदा के हज़ारों छात्र और नौ मंज़िला पुस्तकालय की परंपरा, विक्रमशिला, वल्लभी और नालंदा का नया जन्म।
रोहित टंडन · 22 अक्टूबर 2026 · 4 मिनट
जब दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत भी नहीं हुई थी, तब भारत में ऐसे शिक्षा केंद्र थे जहाँ एशिया के कोने-कोने से छात्र पढ़ने आते थे। प्राचीन भारत के विश्वविद्यालय — ख़ासकर तक्षशिला और नालंदा — दर्शन, व्याकरण, चिकित्सा, गणित और खगोल जैसे विषयों के बड़े केंद्र थे। यहाँ इनकी कहानी दी गई है।
प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्र
| केंद्र | आज कहाँ | समय | ख़ास बात |
|---|---|---|---|
| तक्षशिला | पाकिस्तान (रावलपिंडी के पास) | लगभग 5वीं सदी ईसा पूर्व से | चाणक्य से जुड़ी परंपरा; यूनेस्को विश्व धरोहर |
| नालंदा | बिहार (राजगीर के पास) | 5वीं सदी ईस्वी से लगभग 12वीं सदी तक | हज़ारों छात्र और विशाल पुस्तकालय; यूनेस्को विश्व धरोहर |
| वल्लभी | गुजरात | लगभग 6ठी–8वीं सदी | मैत्रक राजाओं के संरक्षण में |
| विक्रमशिला | बिहार (भागलपुर के पास) | लगभग 8वीं सदी के अंत से | पाल राजा धर्मपाल ने स्थापना की |
| ओदंतपुरी | बिहार (बिहार शरीफ़) | लगभग 8वीं सदी से | पाल राजाओं का संरक्षण |
तक्षशिला: सबसे पुराने केंद्रों में
तक्षशिला आज के पाकिस्तान में रावलपिंडी के पास था और प्राचीन व्यापार मार्गों के चौराहे पर बसा था। यह आज के विश्वविद्यालय जैसा एक संस्थान कम और प्रसिद्ध गुरुओं का एक बड़ा केंद्र ज़्यादा था, जहाँ हर गुरु अपने शिष्यों को पढ़ाता था। परंपरा के अनुसार "अर्थशास्त्र" के रचयिता चाणक्य यहीं पढ़ते और पढ़ाते थे, और व्याकरणाचार्य पाणिनि तथा चिकित्सक जीवक का नाम भी तक्षशिला से जोड़ा जाता है। तक्षशिला के खंडहर 1980 में यूनेस्को विश्व धरोहर बने।
नालंदा: ज्ञान का महासागर
नालंदा महाविहार की स्थापना 5वीं सदी ईस्वी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के समय मानी जाती है। 7वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग (शुआनज़ांग) यहाँ लगभग पाँच साल रहे और पढ़े। उनके और बाद में आए यात्री इत्सिंग के वर्णनों के अनुसार यहाँ हज़ारों छात्र और लगभग दो हज़ार शिक्षक थे। प्रवेश आसान नहीं था — ह्वेनसांग के अनुसार द्वार पर बैठे विद्वान (द्वारपंडित) प्रश्न पूछते थे, और दस में से केवल दो-तीन उम्मीदवार ही सफल होते थे।
- विषय: बौद्ध और वैदिक दर्शन, व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, गणित और खगोल।
- पुस्तकालय: परंपरा के अनुसार इसका नाम "धर्मगंज" था और इसमें तीन बड़े भवन थे — रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक।
- छात्र: चीन, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया और मध्य एशिया तक से।
क्या आप जानते हैं? 12वीं सदी के अंत में बख़्तियार ख़िलजी की सेना के हमले में नालंदा को भारी नुक़सान पहुँचा। परंपरा में कहा जाता है कि इसका पुस्तकालय इतना बड़ा था कि वह कई महीनों तक जलता रहा। 2016 में नालंदा के खंडहर यूनेस्को विश्व धरोहर बने।
विक्रमशिला, वल्लभी और ओदंतपुरी
बिहार के भागलपुर के पास विक्रमशिला की स्थापना पाल राजा धर्मपाल ने की थी। यह तंत्र और बौद्ध दर्शन का बड़ा केंद्र था, और यहाँ के प्रसिद्ध आचार्य अतीश दीपंकर ने तिब्बत जाकर बौद्ध धर्म के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। गुजरात का वल्लभी पश्चिम भारत का प्रमुख शिक्षा केंद्र था, और ओदंतपुरी भी पाल राजाओं के संरक्षण में फला-फूला।
नालंदा का नया जन्म
लगभग आठ सौ साल बाद, 2010 में संसद के एक क़ानून से नालंदा विश्वविद्यालय फिर से स्थापित हुआ, और 2014 में पढ़ाई शुरू हुई। इसमें कई एशियाई देशों का सहयोग है। 19 जून 2024 को राजगीर में इसके नए परिसर का उद्घाटन हुआ। इस तरह प्राचीन ज्ञान की यह परंपरा आज फिर जीवित है। प्राचीन भारत के बारे में और पढ़ें: प्राचीन भारत के रोचक तथ्य और दुनिया की सबसे पुरानी भाषा।
मुख्य बिंदु
- तक्षशिला प्राचीन भारत के सबसे पुराने शिक्षा केंद्रों में था; चाणक्य की परंपरा इससे जुड़ी है।
- नालंदा की स्थापना 5वीं सदी में गुप्त काल में हुई।
- ह्वेनसांग ने नालंदा में पढ़ाई की और उसका विस्तृत वर्णन लिखा।
- विक्रमशिला की स्थापना पाल राजा धर्मपाल ने की।
- नया नालंदा विश्वविद्यालय 2014 से चल रहा है; नया परिसर 2024 में खुला।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की?
इसकी स्थापना 5वीं सदी ईस्वी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के समय मानी जाती है।
तक्षशिला आज कहाँ है?
पाकिस्तान में, रावलपिंडी के पास।
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स्रोत
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