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सिक्के कैसे बनते हैं: टकसाल से आपकी जेब तक

आपकी जेब का हर सिक्का भारत सरकार की चार टकसालों में से किसी एक में ढला है और RBI व बैंकों के रास्ते आप तक पहुँचा है। यहाँ पूरा सफ़र, कदम-दर-कदम।

· 30 अक्टूबर 2026 · 4 मिनट

सिक्के कैसे बनते हैं: टकसाल से आपकी जेब तक

सिक्के कैसे बनते हैं (how coins are made)? भारत में हर सिक्के की शुरुआत सरकारी टकसाल (mint) में धातु की एक लंबी पट्टी से होती है। मशीनें इस पट्टी से गोल चकतियाँ काटती हैं, भट्टी में उन्हें नरम करती हैं, एक ही चोट में दोनों तरफ़ डिज़ाइन छाप देती हैं और फिर गिनकर थैलों में भर देती हैं। ये थैले भारतीय रिज़र्व बैंक के पास जाते हैं, जो इन्हें बैंकों के ज़रिए आपकी जेब तक पहुँचाता है।

किराने की दुकान पर दिए गए ₹1 ने भी यही सफ़र तय किया है। इन चरणों से यह भी समझ आता है कि साल के नीचे छोटा निशान क्यों होता है और कुछ सिक्के चुंबक (magnet) से क्यों चिपकते हैं।

भारत में कौन-से सिक्के बनेंगे, यह कौन तय करता है?

भारत में सिक्के बनाने का अधिकार केवल भारत सरकार के पास है। सिक्का अधिनियम, 2011 (Coinage Act, 2011) के तहत सरकार हर सिक्के का मूल्य, आकार, धातु और डिज़ाइन तय करती है, और किसी भी सिक्के का अंकित मूल्य ₹1,000 से ज़्यादा नहीं हो सकता। यही कारण है कि नए सिक्कों की घोषणा वित्त मंत्रालय करता है, रिज़र्व बैंक नहीं।

सिक्के ढालने का काम सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) करती है, जो पूरी तरह सरकार की कंपनी है। तैयार सिक्कों को रिज़र्व बैंक चलन में लाता है।

भारत के सिक्के कहाँ बनते हैं, और यह कैसे पहचानें?

SPMCIL की चार भारत सरकार टकसालें मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और नोएडा में हैं। हर टकसाल साल के ठीक नीचे अपना छोटा निशान छोड़ती है, जिससे घर का कोई भी सिक्का बता देता है कि वह कहाँ बना।

टकसालसाल के नीचे निशानजानने लायक एक बात
मुंबईछोटा हीरा ◆1829 से सिक्के ढाल रही है
हैदराबादतारा ★SPMCIL की चार टकसालों में से एक
नोएडाबिंदु ●आज़ादी के बाद बनी इकलौती टकसाल; काम जनवरी 1986 में शुरू हुआ और 1 जुलाई 1988 को राष्ट्र को समर्पित हुई
कोलकाताकोई निशान नहींअलीपुर की मौजूदा इमारत 19 मार्च 1952 को खुली

इसलिए बिना निशान वाला सिक्का कोलकाता का है। भारत के पुराने नामों पर प्रोजेक्ट बनाने वाले बच्चे ग़ौर करते हैं कि हर सिक्के पर "भारत" और "INDIA" दोनों लिखे होते हैं।

सिक्का कदम-दर-कदम कैसे बनता है?

टकसाल में धातु सही मोटाई की लंबी पट्टियों (coil) में आती है। ब्लैंकिंग प्रेस इस पट्टी से गोल चकतियाँ वैसे ही काटती है, जैसे रसोई में बेली हुई लोई से स्टील के गिलास से गोल टुकड़े काटे जाते हैं। इन्हें कोरी चकती (blank) कहते हैं, और बची पट्टी दोबारा पिघलाने भेज दी जाती है।

कटाई से धातु सख़्त और भुरभुरी हो जाती है, इसलिए चकतियों को भट्टी में गर्म करके धीरे-धीरे ठंडा किया जाता है। इस चरण को अनीलन (annealing) कहते हैं, जिससे धातु नरम होकर साफ़ डिज़ाइन ले पाती है। फिर चकतियाँ धोकर सुखाई जाती हैं, क्योंकि धूल या तेल सिक्के का चेहरा बिगाड़ देता।

इसके बाद एक मशीन हर चकती पर पतला उभरा किनारा (rim) बनाती है, जो गुल्लक में सिक्कों की रगड़ से डिज़ाइन को बचाता है। आख़िर में सिक्का-प्रेस में कठोर स्टील के दो ठप्पे (die) ऊपर और नीचे से एक साथ चोट करते हैं। फिर सिक्कों की जाँच, मशीन से गिनती और सील थैलों में भराई होती है; SPMCIL के अनुसार नोएडा टकसाल के पास ब्लैंकिंग प्रेस नहीं है, वह बहन-टकसालों से आई चकतियों पर छपाई करती है।

क्या आप जानते हैं? ₹1 और ₹2 के सिक्के फ़ेरिटिक स्टेनलेस स्टील (ferritic stainless steel) के बने हैं, जिसमें लगभग 83% लोहा और 17% क्रोमियम होता है। लोहे की वजह से ये सिक्के फ़्रिज के चुंबक से चिपक जाते हैं, जबकि ₹10 के सिक्के का ताँबे वाला बाहरी छल्ला नहीं चिपकता।

आपका सिक्का किस धातु का बना है?

₹1 का सिक्का बस कंडक्टर के थैले से लेकर बरसात की गीली सब्ज़ी मंडी तक घूमता है, इसलिए उसे ऐसी धातु चाहिए जो न जल्दी जंग खाए, न घिसे। स्टेनलेस स्टील इस काम के लिए ठीक बैठता है।

मार्च 2019 के नियमों के अनुसार ₹1 का सिक्का 20 mm और ₹2 का 23 mm चौड़ा है, दोनों स्टेनलेस स्टील के। ₹10 के सिक्के का बाहरी छल्ला निकल-पीतल (nickel brass) और बीच का हिस्सा निकल-चाँदी (nickel silver) का है, इसलिए उसके दो रंग आसानी से पहचान में आते हैं।

सिक्का टकसाल से आपकी जेब तक कैसे पहुँचता है?

टकसाल से सील थैले रिज़र्व बैंक के पास जाते हैं, जो उन्हें अपने कार्यालयों और करेंसी चेस्ट (currency chest) से आगे भेजता है। करेंसी चेस्ट RBI की ओर से बैंकों के रखे भंडार हैं, जहाँ से आपकी बैंक शाखा दुकानों और ग्राहकों के लिए सिक्के लेती है।

₹1 और उससे ऊपर के सिक्के ₹1,000 तक की रक़म के लिए वैध मुद्रा (legal tender) हैं, और 50 पैसे का सिक्का ₹10 तक के लिए; बिगड़ा या बहुत घिसा सिक्का वैध मुद्रा नहीं रहता। शादियों के मौसम में शगुन के लिफ़ाफ़े के लिए नए ₹1 के सिक्कों की माँग बढ़ जाती है, जो भारतीय संस्कृति की परंपराओं में से एक है।

मुख्य बिंदु

  • सिक्का अधिनियम, 2011 के तहत केवल भारत सरकार सिक्के बनाती है, और कोई सिक्का ₹1,000 से अधिक मूल्य का नहीं हो सकता।
  • SPMCIL चार टकसालों में सिक्के ढालती है: मुंबई (◆), हैदराबाद (★), नोएडा (●) और कोलकाता (कोई निशान नहीं)।
  • चरण हैं: धातु की पट्टी, चकती कटाई, अनीलन, सफ़ाई, किनारा बनाना, छपाई, जाँच, गिनती और थैलों में भराई।
  • ₹1 और ₹2 के सिक्के स्टेनलेस स्टील के हैं और चुंबक से चिपकते हैं; ₹10 का सिक्का दो धातुओं का है।
  • RBI अपने कार्यालयों, करेंसी चेस्ट और बैंकों के ज़रिए सिक्के बाँटता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत में सिक्के कौन बनाता है, RBI या सरकार?

भारत सरकार SPMCIL की चार टकसालों में सिक्के बनाती है और RBI उन्हें बैंकों के ज़रिए बाँटता है। नोटों का मामला अलग है, क्योंकि नोट RBI जारी करता है।

मेरा सिक्का किस टकसाल में बना, यह कैसे पता करें?

साल के ठीक नीचे देखिए। हीरा यानी मुंबई, तारा यानी हैदराबाद, बिंदु यानी नोएडा और कोई निशान नहीं तो कोलकाता।

क्या दुकानदार को बड़े बिल के लिए सिक्के लेने ही होंगे?

₹1 और ऊपर के सिक्के एक भुगतान में ₹1,000 तक ही वैध मुद्रा हैं, उससे ज़्यादा सिक्के लेना क़ानूनन ज़रूरी नहीं। ऐसी और जानकारियाँ हमारे रोचक तथ्य खंड में हैं।

स्रोत: सिक्का अधिनियम, 2011 (इंडिया कोड) और सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड।

स्रोत

  1. Security Printing and Minting Corporation of India (SPMCIL) (नए टैब में खुलता है)
  2. Reserve Bank of India — Coins (नए टैब में खुलता है)
  3. The Coinage Act, 2011 (नए टैब में खुलता है)

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